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गुर्जरों को आरक्षण का मुद्दा
अदालती नहीं राजनीति का है
एस.पी. मित्तल
निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा में राजस्थान के गुर्जरों को
अनुसूचित जाति के अन्तर्गत पांच प्रतिशत आरक्षण मिलता है या नहीं,
यह अभी गर्भ में ही है। इसके लिए कितने गुर्जर और शहीद होंगे तथा
आन्दोलन किस सीमा तक जाएगा फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन
इतना जरूर है कि गुर्जरों को आरक्षण का मुद्दा अदालती नहीं, बल्कि
राजनीति से जुड़ा हुआ है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बार-बार यह रट
लगाए हुए हैं कि उनकी सरकार अदालत के आदेश से बंधी हुई है।
गुर्जरों को अदालत के फैसले का इन्तजार करना चाहिए। गुर्जर भी यह
जानते हैं कि अदालत का फैसला उनके पक्ष में नहीं आ सकता, क्योंकि
वर्तमान में विभिन्न वर्गो के लिए 49 प्रतिशत आरक्षण दे रखा है।
अदालत संविधान के अनुरूप फैसले करती है। संविधान के अनुरूप 50
प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता। स्वाभाविक है कि
अदालत जब भी फैसला देगी, तब संविधान के प्रावधानों का ध्यान रख कर
ही देगी।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आज भले ही अदालत की आड़ लेकर अपने दायित्व
से बच जाएं, लेकिन राजनीति की यह हकीकत है कि डेढ़ साल पहले जब
तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के शासन में गुर्जरों का
आन्दोलन हुआ तो इन्हीं अशोक गहलोत ने कहा कि भाजपा सरकार ने सही
तरीके से आन्दोलन से मुकाबला नहीं किया। वसुन्धरा राजे और भाजपा
सरकार ने ऐसी रणनीति बनायी, जिसमें जातिगत द्वेष हुआ तथा अनेक
गुर्जर पुलिस की गोली के शिकार हो गए। तब अशोक गहलोत ने एक बार भी
यह नहीं कहा कि गुर्जरों को अदालत के फैसले के अनुरूप व्यवहार करना
चाहिए। अशोक गहलोत को तब भी यह पता था कि संविधान के प्रावधानों के
अनुरूप वर्तमान परिस्थितियों में गुर्जरों को पांच प्रतिशत आरक्षण
नहीं दिया जा सकता है, लेकिन वसुन्धरा राजे के मुख्यमंत्री रहते
अशोक गहलोत ने गुर्जर आन्दोलन को राजनीति से जोड़े रखा। तब समाचार
पत्रों और अन्य माध्यमों से यह अहसास करवाया गया कि यदि अशोक गहलोत
मुयमन्त्री हो जाएं तो गुर्जर आन्दोलन का निपटारा हो सकता है।
अशोक गहलोत के समर्थकों को सफलता भी मिल गई। विधानसभा के चुनावों
में वसुन्धरा राजे और भाजपा चुनाव हारी और राजस्थान में अशोक गहलोत
के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बन गई। सवाल उठता है कि विधानसभा
चुनाव और उससे पूर्व गुर्जर आरक्षण का जो मुद्दा राजनीतिक था, उसे
अब अदालत के माथे पर क्यों लादा जा रहा है? लोकतन्त्र में
निर्वाचित सरकार सबसे बड़ी होती है। कोई भी सरकार अदालतों के फैसलों
के अनुरूप नहीं चलती। यदि अदालतं ही सरकार चलाने लगेंगी तो देश में
लोकतान्त्रिक प्रणाली का क्या होगा? पिछले भाजपा के शासन में
गुर्जरों का यह कहना रहा कि विधानसभा चुनाव के दौरान वसुन्धरा राजे
ने अपनी परिवर्तन यात्रा में बार-बार यह कहा कि वे गुर्जरों को
पांच प्रतिशत आरक्षण दिलवा देंगी। वसुन्धरा राजे जब मुख्यमंत्री
बनीं तो यही बात उनके गले पड़ गई। पूरे पांच साल वसुन्धरा राजे
गुर्जरों को आरक्षण नहीं दिलवा सकी, लेकिन जो गलती परिवर्तन यात्रा
के समय वसुन्धरा राजे ने की, वही गलती भाजपा शासन के दौरान हुए
गुर्जर आन्दोलन में अशोक गहलोत ने की। असल में वसुन्धरा राजे और
अशोक गहलोत दोनों का मकसद मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करना था।
दोनों अपने मकसद में कामयाब तो हो गए, लेकिन गुर्जरों को पांच
प्रतिशत आरक्षण नहीं दिलवा सके। यदि अशोक गहलोत का मकसद सिर्फ
मुख्यमंत्री बनना नहीं होता तो भाजपा शासन में भी अशोक गहलोत को
साफ-साफ कहना चाहिए था कि संविधान के अनुरूप गुर्जरों को आरक्षण
नहीं मिल सकता, लेकिन वसुन्धरा राजे हो या अशोक गहलोत दोनों ने
गुर्जरों के आन्दोलन को राजनीति से जोड़ कर देखा। जो हालात पूर्व
में वसुन्धरा राजे के रहे, वही हालात आज अशोक गहलोत के हो गए हैं
। अशोक गहलोत आज राजस्थान के मुख्यमंत्री हैं और अब उन्हें अपनी
कार्यकुशलता दिखानी चाहिए। उन्हें यह बताना चाहिए कि गुर्जरों के
आन्दोलन से वसुन्धरा राजे ने गलत तरीके से निपटा और मैं आज अच्छे
तरीके से मुकाबला कर रहा हूं। गुर्जर आन्दोलन के कारण यदि किसी
गुर्जर की मौत होती है या आन्दोलन के कारण आम नागरिकों को कोई
परेशानी होती है तो इसकी जिम्मेदारी सरकार के मुखिया के नाते अशोक
गहलोत की होगी।
जहां तक गुर्जरों के नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला का सवाल है तो
उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों के शासन में यह साबित कर दिया है
कि वही सर्व मान्य नेता हैं। भाजपा के शासन में वसुन्धरा राजे और
अब कांग्रेस के शासन में अशोक गहलोत अपने गुर्जर मन्त्रियों के
जरिए गुर्जरों में फूट डलवाने का प्रयास करवा रहे हैं , लेकिन
प्रदेश के अधिकतर गुर्जर कर्नल बैसला के साथ ही नज़र आते हैं ।
बैसला के नेतृत्व पर इस बात का भी फर्क नहीं पड़ा है कि उन्होंने गत
लोकसभा का चुनाव भाजपा के उम्मीदवार के रूप में लड़ा। आज अशोक गहलोत
या कांग्रेस के नेता कर्नल बैसला को भाजपा का एजेंट करार दे दें,
लेकिन इससे उनके नेतृत्व पर कोई असर नहीं पड़ रहा। वर्तमान हालातों
में गुर्जरों का आन्दोलन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए चुनौती बना
हुआ है।
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