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लिव-इन रिलेशनशिप की वकालत करने वाले पहले खुद अमल करके दिखाएं
एस.पी. मित्तल
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद जो प्रगतिशील व्यक्ति लिव-इन-रिलेशनशिप यानि
विवाह पूर्व सम्बंधों की वकालत कर रहे हैं उन्हें सबसे पहले यह घोषणा करनी चाहिए
कि उनके परिवार में जो लड़कियां और लड़के हैं यदि वे विवाह से पूर्व सैक्स सम्बंध
स्थापित कर लेते हैं तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं है। ऐसे प्रगतिशील व्यक्तियों को
यह भी बताना चाहिए कि उनके पुत्र और पुत्रियां किन-किन शिक्षा संस्थानों में
अध्ययन कर रहे हैं या किन कंपनियों में नौकरी करते हैं। ऐसे पुत्र-पुत्रियों की
पहचान के बाद ये व्यक्ति घोषणा करे कि उन्हें अपने इन पुत्र-पुत्रियों के लिव-इन
रिलेशनशिप पर कोई ऐतराज नहीं है। यानि वकालत करने वाले व्यक्ति अपने पुत्र और
पुत्रियों को विवाह पूर्व सैक्स सम्बंध स्थापित करने की छूट दे दें। यदि व्यक्ति
ऐसा करते हैं तो उन्हें लिव-इन रिलेशनशिप की वकालत करने का पूरा अधिकार है
क्योंकि वे अपने कहे पर अमल भी कर रहे हैं । यानि ऐसे व्यक्तियों की कथनी और करनी
में कोई अन्तर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद विवाह पूर्व सैक्स
सम्बंधों को लेकर जोरदार बहस छिड़ गई है। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर बहस हो
रही है। सभी टीवी चैनलों पर ऐसे व्यक्ति नज़र आ रहे है जो लिव-इन-रिलेशनशिप को
जायज ठहराकर अपनी छवि प्रगतिशील प्रदर्शित कर रहे हैं , लेकिन अभी तक भी किसी भी
टीवी चैनल पर ऐसा व्यक्ति नहीं आया है जो अपने पुत्र और पुत्री को विवाह पूर्व
सैक्स सम्बंध रखने की छूट देने की घोषणा कर रहा है। यानि मीडिया में जो भी बहस हो
रही है वह दूसरों के लिए है। टीवी चैनल के स्टूडियो में बैठकर किसी भी मुद्दे पर
लंबा भाषण दिया जा सकता है, लेकिन भाषण देने वाले पर अमल करने की बात हो तो एक भी
व्यक्ति सामने नहीं आता।
असल में देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत नज़रिए से देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने विवाह पूर्व सैक्स सम्बंधों को जायज ठहराने की बात नहीं कही।
अभिनेत्री खुशबू के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ इतना कहा है कि लिव-इन
रिलेशनशिप कानूनी जुर्म नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन
रिलेशनशिप को वैध ठहरा दिया है। हम सब जानते हैं कि भारतीय न्याय तन्त्र की आंखों
पर पट्टी बंधी हुई है। अदालत में जो सबूत प्रस्तुत किए जाते हैं , उसके आधार पर
न्याय की मूर्ति फैसला सुनाती है और यह फैसला भी संविधान में लिखे दिशा-निर्देशों
के अनुरूप होता है। चूंकि भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और इसमें कोई भी व्यक्ति
स्वतन्त्र रूप से रह सकता है। ऐसे में दो बालिग एक साथ रहते हैं तो कानून की नज़र
में कोई अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ कानून के नज़रिए से ही लिव-इन
रिलेशनशिप का फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कुछ लोग अपने नज़रिए से
प्रस्तुत कर रहे हैं । यदि देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट ने तो सच्चे मन से भगवान
कृष्ण और राधा का उदाहरण भी दिया है। संस्कृति में
विEास रखने वाले यह समझ सकते हैं कि भगवान कृष्ण और राधा के बीच सम्बंध किस
प्रकार के थे। आज घर-घर में भगवान कृष्ण और राधा की प्रतिमा को एक साथ रखकर पूजा
अर्चना की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने राधा और कृष्ण का हवाला इसीलिए दिया जो लोग
लिव-इन रिलेशनशिप की वकालत कर रहे है वो कुछ तो समझ सकें। यदि सुप्रीम कोर्ट के
फैसले को विवाह पूर्व सैक्स सम्बंधों के पक्ष में माना जा रहा है तो ऐसे लोग
भगवान कृष्ण और राधा के सम्बंधों पर भी सवालिया निशान लगा रहे हैं। कानून के
जानकार मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का मकसद भगवान कृष्ण और राधा के सम्बंधों पर
सवालिया निशान लगाना नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी बात को कहने के लिए ही राधा
और कृष्ण का उदाहरण दिया है, लेकिन इसे भारत का दुभाüग्य ही कहा जाएगा कि लिव-इन
रिलेशनशिप को लेकर प्रगतिशील कहे जाने वाले लोग भगवान कृष्ण और राधा के सम्बंधों
पर भी सवालिया निशान लगा रहे हैं।
असल में इन दिनों भारत पर पश्चिमी संस्कृति का तेजी से हमला हुआ है। अमेरिका,
इंग्लैण्ड, फ्रांस जैसे पश्चिम के देशों में विवाह पूर्व सैक्स सम्बंधों पर कोई
ऐतराज नहीं है, लेकिन आज इन देशों की जो सामाजिक स्थिति है उससे वहां की सरकारें
भी बेहद परेशान है। पश्चिम के देशों में सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह टूट गया है।
हालत इतनी खराब है कि व्यस्क होने से पहले ही लड़कियां गर्भवती हो रही है। इन देशों
में शादी के कोई मायने नहीं है। कुछ ऐसा ही हाल भारत में होने लगा है। लिव-इन
रिलेशनशिप शब्द पश्चिम के देशों से भारत में आया है। जो लोग पश्चिम की संस्कृति
के पक्षधर हैं वे ही अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अपने नज़रिए से देख रहे हैं।
बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियों के भारत में पैर पसारने लेने के बाद अब यहां के
लड़के-लड़कियां भी इन कंपनियों में एक साथ काम करने लगे हैं । देश में जिस प्रकार
सामाजिक परिवेश तेजी से बदल रहा है, उसमें बड़े शहरों और महानगरों में कामकाजी
लड़के-लड़कियों के एक साथ रहने पर कोई ऐतराज भी नहीं हो रहा। हम अपने आस-पास के
माहौल में ही देंखे तो ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें एक साथ काम करने वाले
लड़के-लड़कियां आपसी सहमति से विवाह कर रहे है। इसमें जाति बंधन को भी नहीं देखा जा
रहा। ऐसे में माता-पिता की सहमति न होने के बाद भी मजबूरी में विवाह हो रहे हैं।
विवाह होने तक तो कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन विवाह के बाद लड़के-लड़कियों के बीच जो
तनाव होता है वह तलाक तक पहुंच जाता है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि आपसी सहमति से
विवाह कर लेने वाले लड़के-लड़कियां विवाह से पहले ही लिव-इन रिलेशनशिप पर अमल कर
लेते है। यही व्यवस्था भारतीय संस्कृति की विवाह प्रणाली को नष्ट कर रही है।
लड़के-लड़कियां उच्च शिक्षा और कंपनियों में नौकरी करने के लिए महानगरों में जाते
ही है, लेकिन हमें अपने बच्चों को लिव-इन रिलेशनशिप की शिक्षा देने की बजाए
भारतीय संस्कृति के अनुरूप जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देनी चाहिए।
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